
मर्दानगी का मतलब अपनों पर किया जा रहा शोषण नहीं, बल्कि इनको बराबरी का हक देने के साथ ही इनका मान-सम्मान बनाए रखना और रक्षा करना है। लोगों को यह समझना होगा कि महिलाएं हमारे अधीन नहीं, बल्कि हमारी सहयोगी हैं। ये तो उनका उपकार है, जो हमें सर्वोच्य का दर्जा देती हैं, लेकिन हम उनकी दी हुई इस नेमत को अपना हक मान बैठते हैं और उन पर ही हुक्म चलाने लगते हैं। उन्हें अपने से कमतर आंकने लगते हैं। इसके बाद भी वह ये सब खुशी-खुशी हमारे लिए सहन कर लेती हैं। तो क्या ऐसे में हमारा फर्ज नहीं बनता कि हम भी उन्हें सर्वोच्य का दर्ज दें और उनका मालिक नहीं, बल्कि उनके सहयोगी बनकर उन्हें आगे बढ़ाने में मददगार हों।
जो हमारी जन्मदाता हो वह भला हमारे अधीन कैसे हो सकती है। एक महिला जो हमारी मां, बहन, पत्नी के रूप में हमारे जीवन को संवारने के लिए रात-दिन एक कर देती है। अपना सारा दुख भुलाकर हमारे लिए खुशियां लाती है, हमारे लिए दर-दर मन्नतें मांगती है, हमारी रक्षा के लिए व्रत उपवास करती है, दुआएं करती है, अपने जीवन का पूरा प्यार हमारे लिए न्यौछावर कर देती है, हमारा वंश चलाती, आने वाली पीढिय़ां तैयार करती है भला वह हमारे अधीन कैसे हो सकती है।
मां की ममता और प्यार से बढ़कर इस दुनिया में कोई ऐसी दूसरी वस्तु नहीं है, जो इसकी भरपाई कर सके। मां हमारे गर्भ में आने से लेकर हमारे जन्म होने तक कितने कष्ट सहती है, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। हमारे गर्भ में आने का पता चलते ही वह कितनी खुश हो जाती है। उसे लगता है उसके जीवन की सबसे अनमोल चीज उसे मिल गई है। जन्म लेने के बाद वह खुशी से पागल हो जाती है। लोगों को मिठाइयां बांटती फिरती है। लोगों से अपने लल्ला की बड़ाई करते कभी थकती नहीं है। भरी बरसात और कड़ाके की ठंड में हमें सूखे बिस्तर पर सुलाकर खुद गीले बिस्तर पर लेट जाती है, हमेें खंरोच भी लग जाए तो वह उसे बड़े घाव जैसा लगता है, भला वह हमारे अधीन कैसे हो सकती है। बहन जो हमारे लिए हर पल दुआएं मांगती है। जगह-जगह मन्नत के गाधे बांधती है। मंदिर-मंदिर मांथा टेकती है। हर सुख-दुख में हमारे साथ खड़ी होती है, वह भला हमारे आधीन कैसे हो सकती है। पत्नी जो हमारे जागने से लेकर सोने तक हमारी ही सेवा में लगी रहती है। हमारे लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर देती है। अपनी सारी खुशियां हमारे लिए लुटा देती है, भला वह हमारे आधीन कैसे हो सकती है।
ऐसे ही महिलाओं से ढेर सारे हमारे रिस्ते हैं, जिनमें बुआ, मौसी, चाची, दादी, नानी आदि हैं जो कहीं न कहीं हमारे लिए खुशियां तलाशती हैं। हमारे लिए दुआएं करती हैं, मन्नते मांगती हैं, हमारी रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी तक लगा देती हैं, भला वह हमारे आधीन कैसे हो सकती हैं। सच तो यह है कि जन्म से लेकर मरण तक हम उनके आधीन रहते हैं, लेकिन हमारा दंभ हमें बार-बार ऐसा करने से रोकता है, जो हमारे जीवन के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे मानव समाज के लिए शर्म की बात है। भला हम कब से इतने बलशाली हो गए जो अपनी मां, बहन, पत्नी आदि को अपने अधीन रख सकें।
क्या हमारे नाम के आगे लगा पुरुष के नाम पर मर्दानगी का तमगा ही हमें सर्वोपरि बना देता है। क्या यही हमारे सभी रिस्ते, नातों को दूर करता है। क्या यही तमगा हमें मां की ममता, बहन का प्यार, पत्नी के समर्पण को पैरों तले कुचलने के लिए मजबूर कर देता है। यदि ऐसा है तो हमें यह तमगा नहीं, बल्कि इन सबका प्यार और दुलार चाहिए। हमें समझना होगा कि पुरुष के नाम पर मर्दानगी का यह तमगा हमसे कितनी अमूल्य चीजें छीन रहा है, जिसकी इस जीवन में भरपाई करना नामुमकिन होगा।
ऐसे मिल रहा सहयोग :
इस साल महिला थाने में 16 एेसे मामले दर्ज हुए हैं, जहां पति द्वारा घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं को उनके ससुर, ननद और सास थाने लेकर पहुंचे। वहीं दूसरी ओर दुष्कर्म और छेड़छाड़ के 27 एेसे मामले हैं, जहां बेटियों की मदद के लिए पिता आगे आए।
महिला थाने में इस साल शादी का झांसा देकर दुराचार के अब तक 89 मामले दर्ज हो चुके हैं, जिनमें से 23 मामलों में पीडि़ता के पक्ष में उनके दोस्तों ने गवाही दी। जबकि पिछले साल 16 एेसे मामले सामने आए थे, जिसमें दोस्त भी साथ दे रहे है।
सोशल मीडिया में भी मददगार :
भोपाल के एक नर्सिंग कॉलेज की छात्रा ने अपने साथ कॉलेज में होने वाली बदसलूकी के खिलाफ फेसबुक पर आर्टिकल लिखा था। जनवरी में यह मामला प्रकाश में आया तब पुलिस ने आरोपी के खिलाफ कार्रवाई की। इस तरह सोशल मीडिया से मदद लेने वाली लड़कियों की संख्या में इजाफा हो रहा है। 2016 में 25 मामले सामने आए थे, इस साल जून तक 27 मामले आ चुके हैं।
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