पत्थर मुझे कहता है मेरा चाहने वाला.. मैं मोम हूं उसने मुझे छू कर नहीं देखा

Sunday, 11 June 2017

शोषण नहीं सहयोग का नाम है मर्दानगी

  • रोहित वर्मा. 

मर्दानगी का मतलब अपनों पर किया जा रहा शोषण नहीं, बल्कि इनको बराबरी का हक देने के साथ ही इनका मान-सम्मान बनाए रखना और रक्षा करना है। लोगों को यह समझना होगा कि महिलाएं हमारे अधीन नहीं, बल्कि हमारी सहयोगी हैं। ये तो उनका उपकार है, जो हमें सर्वोच्य का दर्जा देती हैं, लेकिन हम उनकी दी हुई इस नेमत को अपना हक मान बैठते हैं और उन पर ही हुक्म चलाने लगते हैं। उन्हें अपने से कमतर आंकने लगते हैं। इसके बाद भी वह ये सब खुशी-खुशी हमारे लिए सहन कर लेती हैं। तो क्या ऐसे में हमारा फर्ज नहीं बनता कि हम भी उन्हें सर्वोच्य का दर्ज दें और उनका मालिक नहीं, बल्कि उनके सहयोगी बनकर उन्हें आगे बढ़ाने में मददगार हों। जो हमारी जन्मदाता हो वह भला हमारे अधीन कैसे हो सकती है। एक महिला जो हमारी मां, बहन, पत्नी के रूप में हमारे जीवन को संवारने के लिए रात-दिन एक कर देती है। अपना सारा दुख भुलाकर हमारे लिए खुशियां लाती है, हमारे लिए दर-दर मन्नतें मांगती है, हमारी रक्षा के लिए व्रत उपवास करती है, दुआएं करती है, अपने जीवन का पूरा प्यार हमारे लिए न्यौछावर कर देती है, हमारा वंश चलाती, आने वाली पीढिय़ां तैयार करती है भला वह हमारे अधीन कैसे हो सकती है। मां की ममता और प्यार से बढ़कर इस दुनिया में कोई ऐसी दूसरी वस्तु नहीं है, जो इसकी भरपाई कर सके। मां हमारे गर्भ में आने से लेकर हमारे जन्म होने तक कितने कष्ट सहती है, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। हमारे गर्भ में आने का पता चलते ही वह कितनी खुश हो जाती है। उसे लगता है उसके जीवन की सबसे अनमोल चीज उसे मिल गई है। जन्म लेने के बाद वह खुशी से पागल हो जाती है। लोगों को मिठाइयां बांटती फिरती है। लोगों से अपने लल्ला की बड़ाई करते कभी थकती नहीं है। भरी बरसात और कड़ाके की ठंड में हमें सूखे बिस्तर पर सुलाकर खुद गीले बिस्तर पर लेट जाती है, हमेें खंरोच भी लग जाए तो वह उसे बड़े घाव जैसा लगता है, भला वह हमारे अधीन कैसे हो सकती है। बहन जो हमारे लिए हर पल दुआएं मांगती है। जगह-जगह मन्नत के गाधे बांधती है। मंदिर-मंदिर मांथा टेकती है। हर सुख-दुख में हमारे साथ खड़ी होती है, वह भला हमारे आधीन कैसे हो सकती है। पत्नी जो हमारे जागने से लेकर सोने तक हमारी ही सेवा में लगी रहती है। हमारे लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर देती है। अपनी सारी खुशियां हमारे लिए लुटा देती है, भला वह हमारे आधीन कैसे हो सकती है। ऐसे ही महिलाओं से ढेर सारे हमारे रिस्ते हैं, जिनमें बुआ, मौसी, चाची, दादी, नानी आदि हैं जो कहीं न कहीं हमारे लिए खुशियां तलाशती हैं। हमारे लिए दुआएं करती हैं, मन्नते मांगती हैं, हमारी रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी तक लगा देती हैं, भला वह हमारे आधीन कैसे हो सकती हैं। सच तो यह है कि जन्म से लेकर मरण तक हम उनके आधीन रहते हैं, लेकिन हमारा दंभ हमें बार-बार ऐसा करने से रोकता है, जो हमारे जीवन के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे मानव समाज के लिए शर्म की बात है। भला हम कब से इतने बलशाली हो गए जो अपनी मां, बहन, पत्नी आदि को अपने अधीन रख सकें। क्या हमारे नाम के आगे लगा पुरुष के नाम पर मर्दानगी का तमगा ही हमें सर्वोपरि बना देता है। क्या यही हमारे सभी रिस्ते, नातों को दूर करता है। क्या यही तमगा हमें मां की ममता, बहन का प्यार, पत्नी के समर्पण को पैरों तले कुचलने के लिए मजबूर कर देता है। यदि ऐसा है तो हमें यह तमगा नहीं, बल्कि इन सबका प्यार और दुलार चाहिए। हमें समझना होगा कि पुरुष के नाम पर मर्दानगी का यह तमगा हमसे कितनी अमूल्य चीजें छीन रहा है, जिसकी इस जीवन में भरपाई करना नामुमकिन होगा। 
मौजूदा समय में ऐसे दो मामले सामने आए हैं जो यह बताते हैं कि अब समाज में बदलाव आ रहा है। लोग घर की महिलाओं को अपने अधीन नहीं, बल्कि उन्हें अपना सहयोगी मान रहे हैं और उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हो रहे हैं। उन्हें आगे लाने का प्रयास कर रहे हैं। उनके दुख-दर्द को समझ रहे हैँ और उसका निदान भी कर रहे हैं। हाल ही में समाचार पत्र में प्रकाशित दो अलग-अलग मामले हैँ जो यह बताते हैं कि किए तरह लोगों की मानसिकता बदल रही है और लोग कैसे अपने आप को बदल रहे हैं। 
 अपनों ने दिया साथ तो बन गई बात भोपाल. बीते 10 दिनों में शहर के अलग-अलग थानों में 6 शिकायतें दर्ज हुईं हैं, जहां लड़कियों ने अपने साथ छेड़छाड़ और ब्लैकमेलिंग के लिए परिवार के किसी खास सदस्य या बेहद खास लोगों में से किसी को आरोपी बताया है। इससे साफ है कि वे अपने ही घर में खुद को महफूज नहीं समझतीं हैं। इन मामलों में परिवार के बाकी सदस्यों ने साथ दिया इसलिए लड़कियां पुलिस तक पहुंची। जहां बच्चियों को सपोर्ट नहीं मिल रहा है वहां लड़कियां गौरवी की मदद ले रही हैं। अपने साथ होने वाली हिंसा का विरोध करने से पहले लड़कियां काउंसिलिंग करवा कर खुद को तैयार कर रहीं हैं। 80 मामले आए दिसंबर 2016 से अब तक गौरवी केन्द्र में 80 मामले आए हैं जहां महिलाओं ने घरेलू हिंसा, दहेज प्रताडऩा और लड़कियों ने घर में हो रही मानसिक प्रताडऩा के विरोध में आवाज उठाने से पहले काउसिंलिंग करवाई। एेसे बढ़ा रहे मनोबल काउंसलर बताते हैं कि हम पीडि़ताओं को पहले उनके अधिकारों से परिचित करवाते हैं ताकि वे जान सकें कि उनके साथ यदि मानसिक और शारीरिक प्रताडऩा हो रही है तो वह किस हद तक गलत है। इसके बाद परिवार के सबसे विश्वसनीय व्यक्ति से बात करने की सलाह दी जाती है। जरूरत पडऩे पर काउंसलर खुद उस व्यक्ति से बात करते हैं। गंभीर मामलों में पुलिस की मदद भी ली जा रही है। कई महिलाएं जो ज्यादा तनाव में हैं उन्हें ठीक करने के लिए मनोरोग विशेषज्ञ की सलाह पर दवाएं भी दी जाती हैं। पीडि़ताओं को सलाह दी जाती है कि वे डायरी, ब्लॉग या सोशल मीडिया पर अपने विचार शेयर करें, लोगों की प्रतिक्रियाएं मिलने के बाद उनमें ज्यादा आत्मविश्वास आता है। इनका कहना है : हम पीडि़ताओं के मन से सबसे पहले बदनामी का डर निकालते हैं, जिसके कारण वे अक्सर तनाव में रहती हैं। घर में महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा का विरोध उन्हें खुद करना होता है एेसे मामलों में परिवार भी साथ नहीं देते। काउंसलिंग उनके आत्मविश्वास पैदा करती है। शिवानी सैनी, कोऑर्डिनेटर, गौरवी 
 अपराध में 'अपनेÓ बन रहे बेटियों का सहारा मुसीबत में साथ दे रहे परिजन, ससुराल में अब बहू का साथ दे रहे सास-ससुर भोपाल. बेटियों के साथ होने वाली छेड़छाड़ में आमतौर पर घरवाले चुप्पी साध लेते हैं, लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। बीते दो सालों की तुलना करें तो बेटियों के साथ खड़े होने वाले परिजनों में 20 फीसदी तक बढ़ोतरी हुई है। एेसे में उम्मीद की जा सकती है कि महिलाएं-बेटियां अपने ऊपर होने वाले अपराध को लेकर मुखर होंगी और आरोपियों के हौंसले टूटेंगे। गंभीर अपराध होने पर पिता और मां बेटी का पक्ष लेकर पुलिस की मदद ले रही है। वहीं अभी पारिवारिक विवादों के मामलों में भाइयों का सहयोग बेटियों को कम मिल रहा है। लेकिन ससुराल में बहु का साथ देने वाले सास-ससुर की संख्या बढ़ी है। इससे साफ है कि समाज में बेटियों के अधिकारों के लिए परिवार वाले सजग हो रहे हैं। 
 ऐसे मिल रहा सहयोग : 
इस साल महिला थाने में 16 एेसे मामले दर्ज हुए हैं, जहां पति द्वारा घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं को उनके ससुर, ननद और सास थाने लेकर पहुंचे। वहीं दूसरी ओर दुष्कर्म और छेड़छाड़ के 27 एेसे मामले हैं, जहां बेटियों की मदद के लिए पिता आगे आए। महिला थाने में इस साल शादी का झांसा देकर दुराचार के अब तक 89 मामले दर्ज हो चुके हैं, जिनमें से 23 मामलों में पीडि़ता के पक्ष में उनके दोस्तों ने गवाही दी। जबकि पिछले साल 16 एेसे मामले सामने आए थे, जिसमें दोस्त भी साथ दे रहे है। सोशल मीडिया में भी मददगार : भोपाल के एक नर्सिंग कॉलेज की छात्रा ने अपने साथ कॉलेज में होने वाली बदसलूकी के खिलाफ फेसबुक पर आर्टिकल लिखा था। जनवरी में यह मामला प्रकाश में आया तब पुलिस ने आरोपी के खिलाफ कार्रवाई की। इस तरह सोशल मीडिया से मदद लेने वाली लड़कियों की संख्या में इजाफा हो रहा है। 2016 में 25 मामले सामने आए थे, इस साल जून तक 27 मामले आ चुके हैं।

Monday, 16 May 2011

इशारे कैसे-कैसे....



इशारे तुम अगर समझो राज को राज रहने दो। वाकई ये इशारे भी बड़े काम के होते हैं। बचपन के इशारों की याद आते ही मानो उसकी अनंत यादों में डूब जाता हूं। बात उन दिनों की है जब मै छोटा बच्चा था, उमर का कच्चा था, दुनियादारी से कोई सरोकार नहीं था। उस समय केवल पढऩा दोस्तों के साथ खूब मस्ती करना और खेलना ही आता था। बस फिर क्या था पूरा दिन इसी में बीत जाता था, बल्कि यू कहें की शाम का अंधेरा भी डरावना नहीं लगता था। हां तो मै बात कर रहा था इशारों की उस समय इशारे ही थे, जिनके माध्यम से दोस्तों को घर से बाहर खेलने के लिए बुलाना होता था, क्योंकि यदि घर वालों को पता चल गया तो मानो सामत आ गई। उस समय मोबाइल का इतना क्रेज था नहीं कि मैसेज कर दें और सामने वाला सामने खड़ा हो, फिर तो ऐसे में इशारे ही काम आते थे। उनमें कभी आखों से तो कभी हाथ, अंगुली और गर्दन हिला के इशारे कर देते थे। और सामने वाला इशारे को समझकर बच बचाकर नियत स्थान पर पहुंच जाता।
हां आंखों के इशारे को नयन मटक्का कहा जाता था, जो बड़े ही काम का होता था। इसमें सब आंखों ही आंखों में तय हो जाता था। उस समय के प्रेमी युगल भी नैन मटक्का से ही अपने प्रेम का इजहार करते थे। वहीं स्कूल की क्लास में भी कम इसारे बाजी नहीं होती। एक तरफ मास्साब बोर्ड पर लिखने में तल्लीन रहते हैं तो वहीं पीछे बैठे छात्र एक दूसरे से इशारे बाजी में मशगूल रहते हैं। इनमें कभी पेन की नीब चुभोकर तो कभी खोदा-खादी कर इशारे बाजी करते रहते हैं। आज तो इशारों के रूप भी बदल गए हैं, अब इनके कई रूप हो गए हैं। इसमें एसएमएस, मेल, फेस बुक, आरकुट, ट्यूटर आदि हैं। इन इशारों से लोगों को समय की बचत और सिक्योरिटी तो मिलती है, लेकिन परेशानियां भी कम नहीं हैं। 
बात इशारे बाजी की हो तो फिर पूछना ही क्या, तो जनाब एक दिन मैं किसी काम से क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय गया। संयोग से उस कक्ष के पास पहुंच गया, जहां लाइसेंस के लिए परीक्षा देने कुछ युवा और कुछ युवतियां अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। अब समय था इशारे से बात को समझना और इशारे से उत्तर देकर उत्तीर्ण होने का। फिर क्या था शुरू हुआ इशारे बाजी का खेल। इसमें कंप्यूटर दीवार पर लगे परदे पर इशारा करके पश्र बता रहा था तो परीक्षार्थी अपनी सीट पर लगी बटन के इशारे से उसका उत्तर बता रहे थे, तो कुछ परीक्षार्थी कक्ष में उपस्थित इशारे बाजों के इशारे का इंतजार कर रहे थे कि ये इशारा करें तो हम भी प्रश्रों के उत्तर को बटन दबाकर इशारा कर दें। ऐसे मेें भला वो इस इशारे बाजी के खेल मेंं कहां पीछे रहने वाले थे। वो बाकायदा अंगुलियों को चला फिरा कर इशारा करते रहे। इस तरह परीक्षा कक्ष में पूरे दस मिनट तक इशारे बाजी का खेल चलता रहा। गड़बड़ तो तब हो गई जब एक परीक्षार्थी इस इशारे बाजी के खेल में फेल हो गया। उसने आरोप लगाते हुए कहा कि मैने तो बटन दबाकर इसारा किया था, पर वो मेरे इशारे को समझ नहीं पाई तो भला इसमें मेरी क्या खता। आखिर मुझे वो मशीन क्यों नहीं दी गई जो बखूबी इशारे को समझती है। इस पर वहां मौजूद स्टाफ ने कहा कि आप पहले ही इशारे को नहीं समझे तो इसमें भला मेरा क्या दोश। जो पहले मिलकर इसारे को इशारे से समझ गए वो इशारे से उत्तीर्ण हो गए। इस पर मातहतों ने युवक को समझाते हुए कहा कि जब भी आप अगली बार आना तो पहले ही इशारे को इशारे से समझ जाना। भाई ये तो हाल रहा आरटीओ विभाग का। ऐसा नहीं है कि अकेला आरटीओ विभाग ही इस इशारे बाजी में अव्वल है। ये तो हर ऑफिस का दस्तूर ही बन गया है कि आप वहां पहुंंचते ही संबंधित अधिकारी, कर्मचारी के इशारे को पहले ही ससझ जाएं, ताकि वहां जाने का आपका परपज इशारे से पूरा हो जाए। और आप भी हंसी खुशी से गाते मुस्कुराते अपनी राह पकड़ लें।

Friday, 29 April 2011

अब नहीं चेते तो फिर कब...

रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून, पानी गए न उबरे मोती मानुष चून शयद यह सच ही कहा गया है, कि बिना पानी के जीवन ही ब्यर्थ है। हमारा शरीर जिन पांच तत्वों से मिलकर बना है, उनमें से एक प्रमुख तत्व जल भी है। वास्तव में जल के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। विष्व का प्रत्येक जीव किसी न किसी प्रकार जल से ही जीवन प्राप्त करता है।
 हमारा शरीर देखने में भले ही ठोस प्रतीत होता है, लेकिन यह जल से ही बना है। हमारे शरीर में लगभग 70 प्रतिषत तक जल होता है। शरीर के प्रत्येक ऊतक और अंग तक आक्सीजन पहुॅचाने का कार्य करने वाले रक्त में तो 80 प्रतिषत तक जल होता है। स्पष्ट है कि जल जीवन के लिए बेहद आवष्यक है। सोचो यदि जीवनदायी जल ही न बच पाएगा तो क्या होगा? स्पष्ट है कि हमारा जीवन चल नही पायेगा। वर्तमान समय में जल संकट से निपटने एवं जल का महत्व हम आज भी नहीं समझ सके तो आने वाले समय में कहीं जल की एक-एक बूंद के लिए मोहताज न हो जाएं। वर्तमान में जल संरक्षण के बारे में लोग भले ही कितने भी जागरूक हो गए हों, लेकिन यदि इस भीषण समस्या पर गौर नहीं किया गया तो आने वाला समय कितना भयावह होगा, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।
महान वैज्ञानिक गेटे ने जल के महत्व को बताते हुए लिखा है कि प्रत्येक वस्तु जल से ही उत्पन्न होती है व जल के द्वारा ही प्रतिपादित होती है। पृथ्वी पर जल की कुल मात्रा लगभग 146 करोड़ घन किलोमीटर है। जो 70 प्रतिषत धरातल को ढके हुए है। जल की उपलब्धता मेें से 97 प्रतिषत पानी समुद्र में खारे जल के रूप में मौजूद है। तो  2 प्रतिषत पानी हिम षिखरों पर बर्फ के रूप में जमा हुआ है। मात्र एक प्रतिषत पानी ही पेय जल के रूप में विद्यमान है, लेकिन हमारा दुर्भाग्य है कि हम बचे हुए इस एक प्रतिषत पानी को भी प्रदूषित होने से नहीं बचा पा रहे हैं। बढ़ती जनसंख्या, तेजी से हो रहे औद्योेगीकरण एवं वन विनाष ने जल संकट को बढ़ावा दिया है, जिसके चलते कुएं व बावडि़यां समय से पहले ही सूख रहे हैं। तो वहीं जलाषय और पोखर भी अपने सूखे की कहानी बयां कर रहे हंै।
    प्राचीनकाल मेें पानी को प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त था, किन्तु आज स्थिति इसके विपरीत है। यह दुर्भाग्य है कि स्वधीनता के 58 वर्ष बाद भी हम पानी के संचयन और वितरण का कोई सुव्यवस्थित तरीका नहीं अपना पए। उससे भी दुर्भाग्यपूर्ण स्थित यह रही है, कि परंपरा में पानी का जो प्रबन्ध था उसे भी जाने य अनजाने में छिन्न भिन्न कर दिया गया। आजादी के साथ ही विकास के नए दौर में पारंपरिक जल स्त्र्रोतों को जैसे अप्रसांगिक मान लिया गया है।   
बुजुर्गों का भी यह मानना है कि समस्या पानी की इतनी नहीं है, जितनी कि उसके संकलन की है। लोग पानी का पूरी तरह संचयन कर उसका उपयोग करते थे। तालाब झीलें, कुंए, बावडि़यां, नाले, नालियां, टांकेें, कॅुड, ढाका, बोरियां, सतही जल, छोटे कच्चे बांध और भूजल प्रबंध के प्रमुख घटक थे। कुंए बावडि़यां भूजल स्त्र्रोत थे। बांकी बरसात के पानी का जगह जगह संग्रह कर, उससे सिंचाई भी की जाती थी, लेकिन आज ये पूरे जल स्त्रोत हम सब की लापरवाही और न समझी का षिकार होकर सूखे पड.े हैं। अब आवष्यकता इस बात की है कि उपरोक्त पारंपरिक जल स्त्र्रोतों के महत्व को समझकर उनकी सुरक्षा करें।
साल दर साल जल संकट की स्थित भयावह होती जा रही है। गर्मियांें में जहां पानी को लेकर हाहाकार मचता है, वहीें बारिष का पानी सड़कों पर यू ही बेकार बह जाता है। यह अलग बात है कि हर साल पानी बचाने के नाम पर सरकार, नगर निगम और गैर सरकारी संस्थाएं अपने अपने स्तर पर मुहिम झेड़ती हैं, लेकिन ये सब कुछ दिन बाद ही हवा हवाई हो जाता है। यदि इस पानी को सहेजने की दिषा में हम अब भी कोई ठोस कदम नहीं उठा पाए, तो फिर पछताने के अलावा हमारे पास कुछ भी नहीं बचेगा।
 एक समय था जब जल का खजाना तालाब था, लोग कम थे और जल अधिक था, जल संकट का नामो निषान न था। लेकिन वर्तमान में मनुष्य ने इस खजाने को खाली करने में कोई कोर कसर नहीं छोडी, जिसका खामियाजा आज पीने  के पानी के रूप में हमें एक एक बूंद के लिए तरसना पड रहा है। जल संरक्षण को लेकर गांवों में कुंओं के महत्व को कोई नहीं नकार सकता, लेकिन वर्तमान में कुओं का स्थान हैंडपम्पों ने ले लिया, जो सिर्फ धरती से जल निकालने का काम करते हैं, वापस धरती में भेजने का नहीं। हमने प्राकृतिक संपदा का केवल दोहन ही किया है। कभी उसका स्तर बढ़ाने के लिए कोई ऐसा कार्य नहीं किया, जिससे की प्राकृतिक संपदाओं को संरक्षित किया गया हो। आज तो गांव की गलियों तक को भी शहरों की तरह कंक्रीटीकरण, डामरीकरण, फर्षीकरण कर दिया गया है। जो गली पहले वर्षा के जल को सोखकर धरती के भंडार को भरने में सहायक होती थी, वो आज पक्की नालियां व सड़कों के बनने से बहुत कम मात्रा में जल अंदर जा पाता है। तो वहीं वर्षा जल का 90 से 95 प्रतिषत भाग नदियों के रास्ते बहकर समुद्र में पहुंच जाता है। आज जरूरत है कि गांव के पानी को गांव में ही रोकें, खेत के पानी को खेत में रोकें, ताकि वर्तमान के साथ आने वाले समय में जल संकट से हम सब को निजात मिल सके।
वहीं जल को बचाने के लिए हमें अपने स्तर पर भी भरपूर प्रयास करना चाहिए। जिससे हमारी वसुधा पुनः जल से भरपूर समृद्ध हो सके और आने वाले कल में हम सबको एक एक बूंद के लिए न तरसने पडे। इसके लिए हमें डबरी डबरा, फार्म पाण्ड या डग आउट पाड़ बनाकर, कुड़ी या कुइयां बनाकर, साकपिट का निर्माण कर, पुराने कुंओं, जलाषयों का जीर्णोद्धार कर, सुधार व सफाई कर, कुंओं व नलकूपों में भूजल रिचार्ज कर, सोखता गड्ढा, नाला बंधान कार्य, बोरी बांध घर घर में जल देवता का निर्माण कार्य तथा वर्षा जल संचयन (रेन वाटर हार्वेस्ंिटग) कर वर्षा जल को धरती के अंदर भेज सकते हैं। साथ ही नदी नालों में छोटे-छोटे बांध बनाकर तालाब, सरोवर का निर्माण कर जल को संग्रहीत किया जा सकता है, जो हमारे दैनिक जीवन की आवष्यकता की पूर्ति के साथ ही भू-जल संर्वधन में सहायक होगा। और पानी की समस्या से निपटने में सहायक सिद्ध होगा। हम सबको बहुत तेजी से पुरानी व्यवस्था को बदलकर नई व्यवस्था अपनानी चाहिए।


   
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