पत्थर मुझे कहता है मेरा चाहने वाला.. मैं मोम हूं उसने मुझे छू कर नहीं देखा

Friday, 29 April 2011

अब नहीं चेते तो फिर कब...

रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून, पानी गए न उबरे मोती मानुष चून शयद यह सच ही कहा गया है, कि बिना पानी के जीवन ही ब्यर्थ है। हमारा शरीर जिन पांच तत्वों से मिलकर बना है, उनमें से एक प्रमुख तत्व जल भी है। वास्तव में जल के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। विष्व का प्रत्येक जीव किसी न किसी प्रकार जल से ही जीवन प्राप्त करता है।
 हमारा शरीर देखने में भले ही ठोस प्रतीत होता है, लेकिन यह जल से ही बना है। हमारे शरीर में लगभग 70 प्रतिषत तक जल होता है। शरीर के प्रत्येक ऊतक और अंग तक आक्सीजन पहुॅचाने का कार्य करने वाले रक्त में तो 80 प्रतिषत तक जल होता है। स्पष्ट है कि जल जीवन के लिए बेहद आवष्यक है। सोचो यदि जीवनदायी जल ही न बच पाएगा तो क्या होगा? स्पष्ट है कि हमारा जीवन चल नही पायेगा। वर्तमान समय में जल संकट से निपटने एवं जल का महत्व हम आज भी नहीं समझ सके तो आने वाले समय में कहीं जल की एक-एक बूंद के लिए मोहताज न हो जाएं। वर्तमान में जल संरक्षण के बारे में लोग भले ही कितने भी जागरूक हो गए हों, लेकिन यदि इस भीषण समस्या पर गौर नहीं किया गया तो आने वाला समय कितना भयावह होगा, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।
महान वैज्ञानिक गेटे ने जल के महत्व को बताते हुए लिखा है कि प्रत्येक वस्तु जल से ही उत्पन्न होती है व जल के द्वारा ही प्रतिपादित होती है। पृथ्वी पर जल की कुल मात्रा लगभग 146 करोड़ घन किलोमीटर है। जो 70 प्रतिषत धरातल को ढके हुए है। जल की उपलब्धता मेें से 97 प्रतिषत पानी समुद्र में खारे जल के रूप में मौजूद है। तो  2 प्रतिषत पानी हिम षिखरों पर बर्फ के रूप में जमा हुआ है। मात्र एक प्रतिषत पानी ही पेय जल के रूप में विद्यमान है, लेकिन हमारा दुर्भाग्य है कि हम बचे हुए इस एक प्रतिषत पानी को भी प्रदूषित होने से नहीं बचा पा रहे हैं। बढ़ती जनसंख्या, तेजी से हो रहे औद्योेगीकरण एवं वन विनाष ने जल संकट को बढ़ावा दिया है, जिसके चलते कुएं व बावडि़यां समय से पहले ही सूख रहे हैं। तो वहीं जलाषय और पोखर भी अपने सूखे की कहानी बयां कर रहे हंै।
    प्राचीनकाल मेें पानी को प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त था, किन्तु आज स्थिति इसके विपरीत है। यह दुर्भाग्य है कि स्वधीनता के 58 वर्ष बाद भी हम पानी के संचयन और वितरण का कोई सुव्यवस्थित तरीका नहीं अपना पए। उससे भी दुर्भाग्यपूर्ण स्थित यह रही है, कि परंपरा में पानी का जो प्रबन्ध था उसे भी जाने य अनजाने में छिन्न भिन्न कर दिया गया। आजादी के साथ ही विकास के नए दौर में पारंपरिक जल स्त्र्रोतों को जैसे अप्रसांगिक मान लिया गया है।   
बुजुर्गों का भी यह मानना है कि समस्या पानी की इतनी नहीं है, जितनी कि उसके संकलन की है। लोग पानी का पूरी तरह संचयन कर उसका उपयोग करते थे। तालाब झीलें, कुंए, बावडि़यां, नाले, नालियां, टांकेें, कॅुड, ढाका, बोरियां, सतही जल, छोटे कच्चे बांध और भूजल प्रबंध के प्रमुख घटक थे। कुंए बावडि़यां भूजल स्त्र्रोत थे। बांकी बरसात के पानी का जगह जगह संग्रह कर, उससे सिंचाई भी की जाती थी, लेकिन आज ये पूरे जल स्त्रोत हम सब की लापरवाही और न समझी का षिकार होकर सूखे पड.े हैं। अब आवष्यकता इस बात की है कि उपरोक्त पारंपरिक जल स्त्र्रोतों के महत्व को समझकर उनकी सुरक्षा करें।
साल दर साल जल संकट की स्थित भयावह होती जा रही है। गर्मियांें में जहां पानी को लेकर हाहाकार मचता है, वहीें बारिष का पानी सड़कों पर यू ही बेकार बह जाता है। यह अलग बात है कि हर साल पानी बचाने के नाम पर सरकार, नगर निगम और गैर सरकारी संस्थाएं अपने अपने स्तर पर मुहिम झेड़ती हैं, लेकिन ये सब कुछ दिन बाद ही हवा हवाई हो जाता है। यदि इस पानी को सहेजने की दिषा में हम अब भी कोई ठोस कदम नहीं उठा पाए, तो फिर पछताने के अलावा हमारे पास कुछ भी नहीं बचेगा।
 एक समय था जब जल का खजाना तालाब था, लोग कम थे और जल अधिक था, जल संकट का नामो निषान न था। लेकिन वर्तमान में मनुष्य ने इस खजाने को खाली करने में कोई कोर कसर नहीं छोडी, जिसका खामियाजा आज पीने  के पानी के रूप में हमें एक एक बूंद के लिए तरसना पड रहा है। जल संरक्षण को लेकर गांवों में कुंओं के महत्व को कोई नहीं नकार सकता, लेकिन वर्तमान में कुओं का स्थान हैंडपम्पों ने ले लिया, जो सिर्फ धरती से जल निकालने का काम करते हैं, वापस धरती में भेजने का नहीं। हमने प्राकृतिक संपदा का केवल दोहन ही किया है। कभी उसका स्तर बढ़ाने के लिए कोई ऐसा कार्य नहीं किया, जिससे की प्राकृतिक संपदाओं को संरक्षित किया गया हो। आज तो गांव की गलियों तक को भी शहरों की तरह कंक्रीटीकरण, डामरीकरण, फर्षीकरण कर दिया गया है। जो गली पहले वर्षा के जल को सोखकर धरती के भंडार को भरने में सहायक होती थी, वो आज पक्की नालियां व सड़कों के बनने से बहुत कम मात्रा में जल अंदर जा पाता है। तो वहीं वर्षा जल का 90 से 95 प्रतिषत भाग नदियों के रास्ते बहकर समुद्र में पहुंच जाता है। आज जरूरत है कि गांव के पानी को गांव में ही रोकें, खेत के पानी को खेत में रोकें, ताकि वर्तमान के साथ आने वाले समय में जल संकट से हम सब को निजात मिल सके।
वहीं जल को बचाने के लिए हमें अपने स्तर पर भी भरपूर प्रयास करना चाहिए। जिससे हमारी वसुधा पुनः जल से भरपूर समृद्ध हो सके और आने वाले कल में हम सबको एक एक बूंद के लिए न तरसने पडे। इसके लिए हमें डबरी डबरा, फार्म पाण्ड या डग आउट पाड़ बनाकर, कुड़ी या कुइयां बनाकर, साकपिट का निर्माण कर, पुराने कुंओं, जलाषयों का जीर्णोद्धार कर, सुधार व सफाई कर, कुंओं व नलकूपों में भूजल रिचार्ज कर, सोखता गड्ढा, नाला बंधान कार्य, बोरी बांध घर घर में जल देवता का निर्माण कार्य तथा वर्षा जल संचयन (रेन वाटर हार्वेस्ंिटग) कर वर्षा जल को धरती के अंदर भेज सकते हैं। साथ ही नदी नालों में छोटे-छोटे बांध बनाकर तालाब, सरोवर का निर्माण कर जल को संग्रहीत किया जा सकता है, जो हमारे दैनिक जीवन की आवष्यकता की पूर्ति के साथ ही भू-जल संर्वधन में सहायक होगा। और पानी की समस्या से निपटने में सहायक सिद्ध होगा। हम सबको बहुत तेजी से पुरानी व्यवस्था को बदलकर नई व्यवस्था अपनानी चाहिए।


   
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