पत्थर मुझे कहता है मेरा चाहने वाला.. मैं मोम हूं उसने मुझे छू कर नहीं देखा

Monday, 16 May 2011

इशारे कैसे-कैसे....



इशारे तुम अगर समझो राज को राज रहने दो। वाकई ये इशारे भी बड़े काम के होते हैं। बचपन के इशारों की याद आते ही मानो उसकी अनंत यादों में डूब जाता हूं। बात उन दिनों की है जब मै छोटा बच्चा था, उमर का कच्चा था, दुनियादारी से कोई सरोकार नहीं था। उस समय केवल पढऩा दोस्तों के साथ खूब मस्ती करना और खेलना ही आता था। बस फिर क्या था पूरा दिन इसी में बीत जाता था, बल्कि यू कहें की शाम का अंधेरा भी डरावना नहीं लगता था। हां तो मै बात कर रहा था इशारों की उस समय इशारे ही थे, जिनके माध्यम से दोस्तों को घर से बाहर खेलने के लिए बुलाना होता था, क्योंकि यदि घर वालों को पता चल गया तो मानो सामत आ गई। उस समय मोबाइल का इतना क्रेज था नहीं कि मैसेज कर दें और सामने वाला सामने खड़ा हो, फिर तो ऐसे में इशारे ही काम आते थे। उनमें कभी आखों से तो कभी हाथ, अंगुली और गर्दन हिला के इशारे कर देते थे। और सामने वाला इशारे को समझकर बच बचाकर नियत स्थान पर पहुंच जाता।
हां आंखों के इशारे को नयन मटक्का कहा जाता था, जो बड़े ही काम का होता था। इसमें सब आंखों ही आंखों में तय हो जाता था। उस समय के प्रेमी युगल भी नैन मटक्का से ही अपने प्रेम का इजहार करते थे। वहीं स्कूल की क्लास में भी कम इसारे बाजी नहीं होती। एक तरफ मास्साब बोर्ड पर लिखने में तल्लीन रहते हैं तो वहीं पीछे बैठे छात्र एक दूसरे से इशारे बाजी में मशगूल रहते हैं। इनमें कभी पेन की नीब चुभोकर तो कभी खोदा-खादी कर इशारे बाजी करते रहते हैं। आज तो इशारों के रूप भी बदल गए हैं, अब इनके कई रूप हो गए हैं। इसमें एसएमएस, मेल, फेस बुक, आरकुट, ट्यूटर आदि हैं। इन इशारों से लोगों को समय की बचत और सिक्योरिटी तो मिलती है, लेकिन परेशानियां भी कम नहीं हैं। 
बात इशारे बाजी की हो तो फिर पूछना ही क्या, तो जनाब एक दिन मैं किसी काम से क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय गया। संयोग से उस कक्ष के पास पहुंच गया, जहां लाइसेंस के लिए परीक्षा देने कुछ युवा और कुछ युवतियां अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। अब समय था इशारे से बात को समझना और इशारे से उत्तर देकर उत्तीर्ण होने का। फिर क्या था शुरू हुआ इशारे बाजी का खेल। इसमें कंप्यूटर दीवार पर लगे परदे पर इशारा करके पश्र बता रहा था तो परीक्षार्थी अपनी सीट पर लगी बटन के इशारे से उसका उत्तर बता रहे थे, तो कुछ परीक्षार्थी कक्ष में उपस्थित इशारे बाजों के इशारे का इंतजार कर रहे थे कि ये इशारा करें तो हम भी प्रश्रों के उत्तर को बटन दबाकर इशारा कर दें। ऐसे मेें भला वो इस इशारे बाजी के खेल मेंं कहां पीछे रहने वाले थे। वो बाकायदा अंगुलियों को चला फिरा कर इशारा करते रहे। इस तरह परीक्षा कक्ष में पूरे दस मिनट तक इशारे बाजी का खेल चलता रहा। गड़बड़ तो तब हो गई जब एक परीक्षार्थी इस इशारे बाजी के खेल में फेल हो गया। उसने आरोप लगाते हुए कहा कि मैने तो बटन दबाकर इसारा किया था, पर वो मेरे इशारे को समझ नहीं पाई तो भला इसमें मेरी क्या खता। आखिर मुझे वो मशीन क्यों नहीं दी गई जो बखूबी इशारे को समझती है। इस पर वहां मौजूद स्टाफ ने कहा कि आप पहले ही इशारे को नहीं समझे तो इसमें भला मेरा क्या दोश। जो पहले मिलकर इसारे को इशारे से समझ गए वो इशारे से उत्तीर्ण हो गए। इस पर मातहतों ने युवक को समझाते हुए कहा कि जब भी आप अगली बार आना तो पहले ही इशारे को इशारे से समझ जाना। भाई ये तो हाल रहा आरटीओ विभाग का। ऐसा नहीं है कि अकेला आरटीओ विभाग ही इस इशारे बाजी में अव्वल है। ये तो हर ऑफिस का दस्तूर ही बन गया है कि आप वहां पहुंंचते ही संबंधित अधिकारी, कर्मचारी के इशारे को पहले ही ससझ जाएं, ताकि वहां जाने का आपका परपज इशारे से पूरा हो जाए। और आप भी हंसी खुशी से गाते मुस्कुराते अपनी राह पकड़ लें।
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